कोचिंग वाला प्यार।

आओ तुमको ले चलता हूं, भूली बिसरी यादों में।
प्यार मोहब्ब्त वाली कुछ खट्टी मीठी यादों में।।

बात समय के उस बिंदु की, जब कोचिंग (mahendra) में मैं जाता था।
पढ़ता भी अच्छे से था, और बातें बड़ी बनाता था।।

वहीं एक दिन मैंने तुमको पहली बारी देखा था।
रंग स्वेत, सागर सी आंखे, देख के मन ये बहका था।।

देख तुम्हारी कंचन काया, मै मन्द मन्द मुसकाया था।
क्या करना? क्या नहीं करना? कुछ भी समझ ना आया था।।

कई सीटें क्लास में खाली थी, पर तुम बैठी मेरे पास ही थी।
सबकी नजरें अब मुझ पर थी, और मुझको इसकी आस ना थी।

हे प्रिए उन दिनों अक्सर मै, रात रात भर जगता था।
तुम मेरी भी हो सकती हो, ऐसा ही मुझको लगता था।।

तुम भी वॉट्सएप पे अक्सर, मुझको फोटो भेजा करती थी,
उन चित्रों को देख मुहब्बत, दिन प्रतिदिन ही बढ़ती थी।

वो तुम ही थी जिसने मुझको, यह एहसास कराया था।
प्यार भले एक तरफा हो, पर मैंने उसे निभाया था।।

तुम यदा कदा अब भी मेरे, स्वप्न में आया करती हो।
जो कमियां मेरी थी, वह तुम मुझे बताया करती हो।।

तुम कहती हो कि “हे निश्च्छल” यदि तुम्हारी, प्रेम अभिव्यक्ति हो जाती।
तो सच कहती हूं प्रियतम मेरे, मै सच में तेरी हो जाती।।

पर स्वप्न का क्या है? स्वप्न में चीजे व्यर्थ ही आया करती है,
तेरे जैसी कई और भी है, जो मेरे स्वप्न में आया करती हैं।

मुहब्बत फिर से करने का इरादा कर लिया मैंने,

मुहब्बत फिर से करने का इरादा कर लिया मैंने,
दिखी फिर जो कोई, उसी से वादा कर लिया मैंने।

खुद को बर्बाद करने का चढ़ा फितूर कुछ ऐसा,
कि इस बार इश्क बहुत ज्यादा कर लिया मैंने।

जो कम पड़ी खुशियां तो दामन भर दिया उनका,
लो खुद की खुशियों को भी आधा कर लिया मैंने।

उन्ही का शौक था कि जिंदगी शतरंज बन जाए मेरी,
उन्हें रानी बनाकर खुद को प्यादा कर लिया मैंने।

पता तो था मझे भी इश्क में रोना पड़ेगा रात भर,
फिर भीे नशा ए इश्क हद से ज्यादा कर लिया मैंने।

sk मिश्रा (निश्च्छल)

मै उर्दू सा कठिन नहीं। (हिंदी कविता)

  • मै उर्दू सा कठिन नहीं, गर समझो तुम अल्फ़ाज़ मेरे,

हर शब्द में है एक खनक भरी, हर लफ्ज़ में है जज़्बात मेरे,
जो तुम समझो तो गौहर जैसी है हर बात मेरी,
जो ना समझो तो सच मानो बस मिट्टी है एहसास मेरे।

तुम रहती हो दूर बहुत, कभी आ जाओ ना पास मेरे,
पल भर में धुआं कर दो मिल कर सब संत्रास मेरे,
तुम मुझको पागल समझो, या समझो तुम बकवास मुझे,
पर सच कहता हूं प्रिये, तुम ही हो बस खास मेरे।

कब से बैठा हूं अंखियां मिंचे, तुम आओगी है विश्वास मुझे,
बढ़ रही विरह की अग्नि है, है प्रिये मिलन की आस मुझे,
दिल का आंगन खुला पड़ा है उम्मीदों में
मिल जाए इस अंधियारे में तेरा प्रेम प्रकाश मुझे।

तुम ही हो सागर गहरा, तुम ही हो कैलाश मेरे,
तुम ही हो धरती मेरी, तुम ही हो आकाश मेरे,
तुम वर्षा बन कर बरसो ऐसे, भीग उठे मेरा बनकर मन,
कब से आस में बैठा हूं, लग जाए प्रेम की प्यास मुझे।

Sk mishra (निश्च्छल)

बेरोजगारी पर व्यंग्य।

ना होंगी भर्ती नई ना होगा रोजगार,
बेबस हो सोचें युवा ठग ले गई सरकार,
ठग ले गई सरकार तोड़ उम्मीदें सारी,
लगने वाली थी नौकरी अबकी बारी,
कहें कवि “निश्च्छल” छोड़ के सपने अच्छे,
बेचे युवा बैठ सड़क पर सस्ते कच्छे।

Sk mishra (निश्च्छल)